चिंतन और ध्यान में ये है सबसे बड़ा अंतर

जयपुर (हमारा वतन) चिंतन-मनन ध्यान नहीं है। इनमें बड़ा भेद है। केवल परिमाणात्मक ही नहीं, बल्कि गुणात्मक भेद है। वे भिन्न धरातलों पर अस्तित्व रखते हैं। उनके आयाम बिल्कुल ही भिन्न होते हैं। केवल भिन्न ही नहीं, बल्कि एकदम ही विपरीत होते हैं। यह पहली बात है समझ लेने की, चिंतन संबंध रखता है किसी विषय-वस्तु से। यह दूसरे की ओर जाती चेतना की एक गति है। चिंतन बहिर्मुखी ध्यान है, परिधि की ओर बढ़ता हुआ, केंद्र से दूर होता हुआ। ध्यान है केंद्र की ओर बढ़ना, परिधि से दूर हटना, दूसरे से दूर होना। चिंतन लक्षित होता है दूसरे की ओर, ध्यान लक्षित होता है स्वयं की ओर। चिंतन में द्वैत विद्यमान होता है। वहां दो होते हैं, चिंतन और चिंतनगत। ध्यान में केवल एक ही होता है।

चिंतन और ध्यान में अंतर :-

ध्यान के लिए अंग्रेजी शब्द मेडिटेशन बहुत उपयुक्त नहीं है। यह ध्यान या समाधि का वास्तविक अर्थ नहीं देता, क्योंकि मेडिटेशन शब्द से ही ऐसा प्रकट होता है कि तुम किसी चीज पर ध्यान कर रहे हो, इसलिए यह समझना जरूरी है कि चिंतन किसी चीज पर ध्यान करना है। ध्यान रखें कि किसी चीज पर ध्यान नहीं करना।

केंद्र से हटकर कोई गति नहीं होती, बिल्कुल ही नहीं होती। यह तो बस इतने समग्र रूप से स्वयं जैसा हो जाना है कि एक कपकपाहट भी नहीं होती। आंतरिक लौ अकंप बनी रहती है। दूसरा खो चुका होता है और केवल तुम होते हो। एक भी विचार वहां नहीं रहता। सारा संसार जा चुका होता है। मन अब वहां रहता ही नहीं; केवल तुम होते हो, तुम्हारी परम शुद्धता में। चिंतन तो किसी चीज की प्रतिच्छवि दिखलाते दर्पण की भांति है। ध्यान है, केवल दर्पण होना। यह किसी चीज की प्रतिच्छवि नहीं दिखलाता। वह केवल विशुद्ध क्षमता है दर्पण होने की; लेकिन वास्तव में कोई चीज प्रतिबिंबित नहीं की जा रही होती।

शून्यता का विचार भी एक विचार है :-

चिंतन सहित उपलब्ध हो सकते हो निर्विचार समाधि को, बिना विचार की समाधि, लेकिन निर्विचार में एक विचार बना रहता है। वह होता है-अ-विचार का विचार। वह भी अंतिम विचार होता है, एकदम अंतिम, तो भी वह बना तो रहता है। व्यक्ति सचेत होता है, इसके प्रति कि कोई विचार नहीं है। वह जानता है कि कोई विचार नहीं है, किंतु अ-विचार को जानना क्या होता है? एक बड़ा परिवर्तन आ चुका होता है- विचार मिट चुके होते हैं, लेकिन अब स्वयं अ-विचार ही एक विषय बन जाता है। यदि तुम कहते हो, ‘मैं जानता हूं शून्य को’, तो पर्याप्त शून्य नहीं होता, शून्यता का विचार वहां रहता है। मन अभी भी काम कर रहा होता है, बहुत, बहुत निष्क्रिय, नकारात्मक ढंग से काम कर रहा होता है- लेकिन अभी भी काम तो कर ही रहा है। तुम सजग हो कि वहां शून्यता है।

अब यह शून्यता होती क्या है, जिसके बारे में तुम सजग होते हो? यह बहुत सूक्ष्म होती है। सर्वाधिक सूक्ष्म, अंतिम होती है; जिसके बाद विषय संपूर्णतया तिरोहित हो जाता है। जब कभी कोई शिष्य झेन गुरु के पास अपनी उपलब्धि सहित बड़ी प्रसन्नता से आता है और कहता है, मैंने पा लिया है शून्यता को, तो गुरु कहता है, ‘जाओ और दूर फेंक दो इस शून्यता को। फिर मत लाना इसे मेरे पास। यदि तुम सचमुच ही खाली हुए हो, तो वहां शून्यता का कोई विचार भी नहीं होता।

बोलने-सुनने से ऊपर उठ जाना :-

ऐसा ही हुआ है,सुभूति की उस प्रसिद्ध कथा में। वह वृक्ष तले बैठा हुआ था, बिना किसी विचार के। अ-विचार का विचार भी नहीं था। अकस्मात, फूल बरस पड़े। वह चकित हो गया- ‘क्या घट रहा है?’ उसने देखा चारों ओर; फूल-ही-फूल झरते थे आकाश से। उसे चकित हुआ देखकर देवताओं ने कहा, ‘चकित मत होओ। हमने आज शून्यता पर सबसे बड़ा प्रवचन सुना है। तुमने दिया है उसे। हम उत्सव मना रहे हैं और हम तुम पर ये फूल बरसा रहे हैं, प्रतीक के रूप में। शून्यता पर दिए तुम्हारे प्रवचन पर उत्सव मना रहे हैं।’ सुभूति ने कंधे उचका दिए और बोला, ‘मगर मैं तो कुछ बोला ही नहीं।’ देवताओं ने कहा, ‘हां तुम तो नहीं बोले, और न ही हमने सुना है- यही तो है, शून्यता पर दिया गया सबसे बड़ा प्रवचन।’

तब तुम संपूर्ण होगे :-

यदि तुम बोलते हो, यदि तुम कहते हो, ‘मैं खाली हूं’, तो तुम चूक गए। अ-विचार के विचार तक निर्विचार समाधि होती है। कोई चिंतन-मनन नहीं, लेकिन फिर भी अंतिम अंश तो बाकी है। हाथी गुजर गया है, दुम रह गई है, मगर अंतिम अंश। कई बार दुम ज्यादा बड़ी सिद्ध होती है हाथी से, क्योंकि वह बहुत सूक्ष्म होती है। विचारों को फेंक देना आसान है, लेकिन शून्यता को कैसे फेंकें। अ-विचार को कैसे फेंकें? वह बहुत-बहुत सूक्ष्म होता है। उसे कैसे पूरी तरह समझोगे? ऐसा ही हुआ, जब झेन गुरु ने शिष्य से कहा, ‘जाओ और फेंक दो इस शून्यता को!’ शिष्य कहने लगा, ‘पर कैसे फेकना होगा शून्यता को?’ गुरु कहने लगा, ‘तो ले जाओ इसे। जाओ फेंको इसे। अपने मेरे पास सिर में शून्यता लेकर मत खड़े रहना। कुछ करो इस बारे में।’

यह बहुत सूक्ष्म होता है। कोई चिपक सकता है इससे, लेकिन तब मन ने तुम्हें धोखा दे दिया अंतिम स्थल पर। निन्यानबे प्रतिशत तुम पहुंच चुके, बस आखिरी चरण ही बाकी था। सौ डिग्री पर तो वह संपूर्ण हो चुका होता और तुम तिरोहित हो चुके होते।

रिपोर्ट – राम गोपाल सैनी 

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